Vishalgad Fort & Battle of Pavan Khind | विशालगढ़ किला और पावनखिंड की अमर गाथा

 विशालगढ़ किला : मराठा शौर्य, बलिदान और स्वराज्य की अमर गाथा


प्रस्तावना

महाराष्ट्र की सह्याद्रि पर्वतमाला में स्थित विशालगढ़ किला केवल पत्थरों से बना एक दुर्ग नहीं, बल्कि मराठा साम्राज्य के साहस, त्याग और स्वाभिमान का जीवंत प्रतीक है। यह वही ऐतिहासिक किला है, जिसने संकट की घड़ी में छत्रपति शिवाजी महाराज को आश्रय दिया और जहां से स्वराज्य की रक्षा की अमर कहानी लिखी गई।

विशालगढ़ का नाम आते ही वीर बाजीप्रभु देशपांडे, पावनखिंड का युद्ध और मराठा सैनिकों का अतुलनीय बलिदान स्मरण हो उठता है।


विशालगढ़ किला कहाँ स्थित है?

विशालगढ़ किला महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले की शाहुवाड़ी तहसील में स्थित है। यह दुर्ग सह्याद्रि पर्वत की ऊँची पहाड़ियों पर बना हुआ है। ऊँचाई पर स्थित होने के कारण यह किला प्राकृतिक रूप से बेहद मजबूत और सुरक्षित माना जाता था।

चारों ओर फैली हरियाली, गहरी घाटियाँ और विशाल पर्वत इस किले की भव्यता को और भी अद्भुत बनाते हैं।


विशालगढ़ किले का इतिहास

माना जाता है कि इस किले का निर्माण शिलाहार राजवंश के राजा मार्सिंघ ने लगभग 1058 ईस्वी में करवाया था। उस समय इस किले को “खिलगिल” या “खिलना” कहा जाता था।

बाद में यह किला बहमनी शासन के अधीन चला गया। लगभग 190 वर्षों तक यह किला बहमनी सत्ता के प्रभाव में रहा।

इसके बाद आदिलशाही शासन के समय भी यह किला महत्वपूर्ण सैन्य केंद्र बना रहा।


शिवाजी महाराज और विशालगढ़

28 नवंबर 1659 को छत्रपति शिवाजी महाराज ने आदिलशाह से इस किले को जीत लिया। विजय प्राप्त करने के बाद शिवाजी महाराज ने इसका नाम बदलकर “विशालगढ़” रख दिया।

यह किला शिवाजी महाराज के लिए केवल एक सैन्य दुर्ग नहीं था, बल्कि संकट के समय सुरक्षित शरणस्थली भी बना।

जब पन्हाला किले पर सिद्दी जौहर ने घेरा डाल दिया था, तब शिवाजी महाराज वहां से निकलकर विशालगढ़ पहुंचे थे। इसी घटना से जुड़ी है मराठा इतिहास की सबसे वीर और भावनात्मक घटनाओं में से एक — पावनखिंड का युद्ध।

पावनखिंड की अमर गाथा

घोड़खिंड से पावनखिंड बनने तक

आज जिसे पावनखिंड कहा जाता है, उसे पहले घोड़खिंड के नाम से जाना जाता था।

यह ऐतिहासिक युद्ध 3 जुलाई 1660 को मराठा सैनिकों और आदिलशाही सेना के बीच लड़ा गया था। यह युद्ध केवल एक लड़ाई नहीं, बल्कि स्वराज्य की रक्षा के लिए दिया गया सर्वोच्च बलिदान था।


पन्हाला से विशालगढ़ की ओर प्रस्थान

जब सिद्दी जौहर ने पन्हाला किले को घेर लिया, तब शिवाजी महाराज ने वहां से निकलने की योजना बनाई।

रात के अंधेरे में शिवाजी महाराज लगभग 600 मावला सैनिकों और अपने विश्वसनीय साथियों के साथ विशालगढ़ की ओर निकल पड़े। विशालगढ़ पन्हाला से लगभग 65 किलोमीटर दूर था।

लेकिन यह खबर आदिलशाही सेना तक पहुंच गई। सिद्दी मसूद अपनी विशाल सेना लेकर शिवाजी महाराज का पीछा करने लगा।


बाजीप्रभु देशपांडे का अद्भुत बलिदान

घोड़खिंड के संकरे दर्रे में पहुँचते ही शिवाजी महाराज और उनके साथियों को स्पष्ट दिखाई देने लगा कि शत्रु सेना बहुत निकट आ चुकी है। यदि दुश्मन यहाँ तक पहुँच गया, तो विशालगढ़ पहुँचना अत्यंत कठिन हो जाएगा। ऐसे संकटपूर्ण क्षण में वीर बाजीप्रभु देशपांडे आगे बढ़े और उन्होंने स्वराज्य की रक्षा के लिए अपने जीवन का सबसे बड़ा निर्णय लिया।

बाजीप्रभु ने शिवाजी महाराज के चरणों में प्रणाम करते हुए कहा—

"महाराज, शत्रू आमच्या मागावर आहे. आपण आता काही निवडक मावळ्यांसह विशालगडाकडे निघा. आम्ही इथेच शत्रूला रोखून धरतो."

अपने प्रिय सरदार के मुख से ये शब्द सुनकर शिवाजी महाराज भावुक हो उठे। उन्होंने बाजीप्रभु के कंधों पर हाथ रखते हुए कहा—

"बाजी, आम्ही तुम्हाला अशा मरणाच्या दारावर सोडून कसे जाऊ?"

बाजीप्रभु ने दृढ़ स्वर में उत्तर दिया—

"महाराज, आपण आमचे राजे आहात; पण आज आम्ही आपल्याला वडिलकीच्या नात्याने आज्ञा करतो की आपण ही गोष्ट मानलीच पाहिजे."

फिर उनकी आवाज़ और भी गंभीर हो गई—

"स्वराज्याच्या रक्षणासाठी आमचा देह कामी आला तर आम्ही स्वतःला धन्य समजू. आमच्यासारखे लाखो मेले तरी चालतील; पण लाखोंचा पोशिंदा जगलाच पाहिजे. आपण असाल तरच हे स्वराज्य टिकून राहील."

ये शब्द सुनकर वहाँ उपस्थित प्रत्येक मावले की आँखें नम हो गईं। किसी के पास कुछ कहने के लिए शब्द नहीं थे।


बाजीप्रभु ने आगे कहा—

"महाराज, आपण विशालगडावर सुखरूप पोहोचलात की गडावरून तोफांचे तीन आवाज करा. ते ऐकताच मला समजेल की माझे महाराज सुरक्षित पोहोचले आहेत. त्यानंतरच मी माझे प्राण आनंदाने सोडीन."

फिर उन्होंने हाथ जोड़कर अंतिम निवेदन किया—

"आता विलंब करू नका महाराज. शत्रूला आम्ही इथेच रोखून धरतो. आमचा हा शेवटचा मुजरा स्वीकारा."

यह कहते हुए बाजीप्रभु ने महाराज को अंतिम मुजरा किया। उस क्षण वातावरण अत्यंत भावुक हो उठा। अनेक वीरों की आँखों से अश्रुधारा बह रही थी। शिवाजी महाराज ने अपने वीर साथियों को गले लगाया और भारी मन से विशालगढ़ की ओर प्रस्थान किया। उनके साथ कुछ चुनिंदा मावले थे, जबकि बाजीप्रभु, फुलाजी देशपांडे और लगभग 300 वीर मावले घोड़खिंड में मृत्यु से भीषण संघर्ष करने के लिए तैयार खड़े थे।

यहीं से प्रारंभ हुई मराठा इतिहास की वह अमर गाथा, जिसने घोड़खिंड को सदा के लिए "पावनखिंड" बना दिया।


घोड़खिंड का भीषण युद्ध

शिवाजी महाराज अपने चुनिंदा साथियों के साथ विशालगढ़ की ओर बढ़ गए।

इधर बाजीप्रभु देशपांडे, उनके भाई फुलाजी देशपांडे, रायाजी बांदल और लगभग 300 मराठा सैनिकों ने घोड़खिंड को मोर्चाबंद कर लिया।

कुछ ही समय बाद सिद्दी मसूद अपनी विशाल सेना के साथ वहां पहुंच गया।

इसके बाद शुरू हुआ एक भयंकर युद्ध।

मराठा सैनिकों ने अद्भुत साहस दिखाते हुए दुश्मन सेना को आगे बढ़ने से रोक दिया। बाजीप्रभु दोनों हाथों में तलवार लेकर युद्धभूमि में टूट पड़े।

चारों ओर तलवारों की टकराहट, रणघोष और वीरों की गर्जना गूंजने लगी।

यह संघर्ष लगातार लगभग 9 घंटे तक चलता रहा।

अंतिम क्षण और अमर बलिदान

युद्ध के दौरान बाजीप्रभु गंभीर रूप से घायल हो गए। उनका शरीर रक्त से लथपथ हो चुका था, लेकिन फिर भी वे लड़ते रहे।

उनकी निगाहें केवल एक संकेत की प्रतीक्षा कर रही थीं — विशालगढ़ से आने वाली तोप की तीन आवाजें।

और फिर…

विशालगढ़ से तोपों की तीन गर्जनाएं सुनाई दीं।

बाजीप्रभु समझ गए कि शिवाजी महाराज सुरक्षित किले तक पहुंच चुके हैं।

यह सुनते ही उनके चेहरे पर संतोष की मुस्कान आ गई। स्वराज्य की रक्षा का अपना कर्तव्य पूरा करके उन्होंने रणभूमि में वीरगति प्राप्त की।

उनके साथ फुलाजी देशपांडे, रायाजी बांदल और अनेक मावला सैनिकों ने भी अपने प्राण न्योछावर कर दिए।


घोड़खिंड क्यों कहलायी पावनखिंड?

मराठा वीरों के पवित्र बलिदान से यह भूमि पावन हो गई थी। इसी कारण बाद में घोड़खिंड का नाम बदलकर “पावनखिंड” रखा गया।

आज भी यह स्थान मराठा इतिहास में वीरता, त्याग और स्वराज्य प्रेम का अमर प्रतीक माना जाता है।


विशालगढ़ पर स्थित वीरों की समाधियाँ

विशालगढ़ किले पर आज भी वीर बाजीप्रभु देशपांडे और उनके भाई फुलाजी देशपांडे की समाधियाँ स्थित हैं।

ये समाधियाँ आने वाली पीढ़ियों को मराठा वीरों के अद्भुत साहस और बलिदान की याद दिलाती हैं।

विशालगढ़ का महत्व

विशालगढ़ किला मराठा इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह किला —

शिवाजी महाराज की शरणस्थली रहा

स्वराज्य की रक्षा का साक्षी बना

पावनखिंड जैसे अमर युद्ध से जुड़ा

मराठा वीरता और बलिदान का प्रतीक बना

आज भी हजारों लोग इस ऐतिहासिक किले को देखने और वीर मराठाओं को श्रद्धांजलि देने पहुंचते हैं।

निष्कर्ष :

विशालगढ़ केवल एक किला नहीं, बल्कि मराठा स्वाभिमान की जीवित गाथा है। यहां की मिट्टी में वीरों के बलिदान की सुगंध बसती है।

बाजीप्रभु देशपांडे और उनके साथियों ने अपने प्राण देकर यह सिद्ध कर दिया कि स्वराज्य और धर्म की रक्षा के लिए दिया गया बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता।

पावनखिंड की यह अमर कहानी आने वाली पीढ़ियों को सदैव साहस, निष्ठा और मातृभूमि प्रेम की प्रेरणा देती रहेगी।


जय भवानी! 🚩  जय शिवाजी! 🚩

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Lord Khandoba Story – खंडोबा की पौराणिक कथा, Jejuri Temple aur Haldi Utsav

Somnath Temple History in Hindi | सोमनाथ मंदिर का इतिहास

Lord Dattatreya Story, 24 Gurus & Spiritual Secrets |भगवान दत्तात्रेय की सम्पूर्ण कथा