तानाजी मालुसरे और सिंहगढ़ का इतिहास: 'गढ़ आला पण सिंह गेला' की अमर गाथा
सह्याद्रि की गोद में सिंहगढ़: शौर्य और बलिदान की अमर गाथा महाराष्ट्र के पुणे से लगभग 30 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में, सह्याद्रि की पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित सिंहगढ़ किला इतिहास, शौर्य और स्वाभिमान का जीवंत प्रतीक है। समुद्र तल से करीब 1,312 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह दुर्ग अपने प्राचीन नाम कोंढाणा से जाना जाता था। खड़ी चट्टानों और दुर्गम ढलानों से घिरा यह किला सैन्य दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था। छत्रपति शिवाजी महाराज के स्वराज्य अभियान में कोंढाणा का विशेष महत्व था। 1665 की पुरंदर संधि के बाद यह किला मुगलों के अधिकार में चला गया। 1670 में इसे पुनः प्राप्त करने का दायित्व वीर सेनानायक तानाजी मालुसरे ने संभाला। अपने पुत्र रायबा के विवाह से पहले तानाजी ने व्यक्तिगत सुख से अधिक स्वराज्य के कर्तव्य को महत्व दिया। प्रचलित परंपरा में उनके शब्द आज भी याद किए जाते हैं—“आधी लग्न कोंढाण्याचं, मग माझ्या रायबाचं।” अंधेरी रात में अपने मावलों के साथ तानाजी ने दुर्ग की कठिन चढ़ाई की और मुगल सेना से भयंकर युद्ध किया। उन्होंने अद्भुत वीरता दिखाई, लेकिन युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए। मराठा...