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Mahabharat War: कुरुक्षेत्र का इतिहास | 18 Days War & Hidden Facts

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  महाभारत महायुद्ध – धर्म, नीति और इतिहास की सम्पूर्ण गाथा प्रस्तावना महाभारत का युद्ध केवल कौरवों और पांडवों के बीच राजसिंहासन का संघर्ष नहीं था, बल्कि एक ही कुरुवंश के भाइयों, गुरु और शिष्य, मित्रों तथा अपने ही संबंधियों के बीच लड़ा गया वह महासंग्राम था, जिसने धर्म और अधर्म, न्याय और अहंकार के अंतिम संघर्ष को जन्म दिया। जब अन्याय अपनी सभी सीमाएँ पार कर गया, तब स्वयं भगवान श्रीकृष्ण शांति के अंतिम दूत बनकर हस्तिनापुर पहुँचे और केवल पाँच गाँव देकर युद्ध टालने का प्रयास किया, किंतु दुर्योधन के अहंकार ने सुई की नोक के बराबर भूमि देने से भी इंकार कर दिया। उसी क्षण इतिहास के सबसे भीषण धर्मयुद्ध की नींव पड़ गई। लेकिन इस महायुद्ध से जुड़े अनेक प्रश्न आज भी मानव मन को जिज्ञासु बनाते हैं। पूरे आर्यावर्त में युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र की भूमि ही क्यों चुनी गई? क्या इस पवित्र भूमि का कोई प्राचीन रहस्य था? इस अठारह दिवसीय महायुद्ध के क्या परिणाम हुए? क्या महाभारत केवल एक पौराणिक कथा है, या एक ऐतिहासिक घटना? इसके बारे में ग्रंथ, इतिहासकार, पुरातत्वविद्, विद्वान और वैज्ञानिक क्या कहते हैं? क्या व...

Divine Curses of Hindu Mythology – सनातन धर्म के प्रसिद्ध श्राप और उनके परिणाम

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  पौराणिक ग्रंथों के चर्चित श्राप और उनकी कथाएँ -- प्रस्तावना भारतीय पौराणिक ग्रंथों में श्राप केवल दंड का साधन नहीं, बल्कि कर्मफल और धर्म-अधर्म के परिणामों का प्रतीक भी माना गया है। रामायण, महाभारत और विभिन्न पुराणों में अनेक ऐसे प्रसंग मिलते हैं, जहाँ किसी ऋषि, देवता, तपस्वी या राजा द्वारा दिया गया श्राप आगे चलकर इतिहास की दिशा बदल देता है। प्रस्तुत है पौराणिक ग्रंथों में वर्णित ऐसे ही प्रसिद्ध श्रापों और उनसे जुड़ी रोचक कथाओं की श्रृंखला। 1 . युधिष्ठिर का स्त्री जाति को श्राप (महाभारत का प्रसंग) युधिष्ठिर पांडवों में सबसे बड़े और धर्मराज कहलाते थे। महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद माता कुंती ने उन्हें एक ऐसा रहस्य बताया, जिसने उनके हृदय को झकझोर दिया। कुंती ने बताया कि सूर्यपुत्र कर्ण वास्तव में उनका ज्येष्ठ पुत्र और पांडवों का बड़ा भाई था। यह सत्य सुनकर युधिष्ठिर अत्यंत दुखी हो गए। उन्हें लगा कि यदि यह रहस्य पहले बता दिया गया होता तो महाभारत जैसा विनाशकारी युद्ध टल सकता था। उन्होंने विधिपूर्वक कर्ण का अंतिम संस्कार किया, लेकिन उनके मन का शोक कम नहीं हुआ। क्रोध और पीड़ा में उन्ह...