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Charvaka Darshan in Hindi | चार्वाक दर्शन का इतिहास, सिद्धांत और दर्शन

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  चार्वाक दर्शन: क्या सचमुच केवल “कर्ज लेकर घी पियो” ही था उनका संदेश? प्रस्तावना भारतीय चिंतन का इतिहास केवल आस्था और मान्यताओं की कहानी नहीं है। यह उन लोगों की भी कहानी है, जिन्होंने प्रचलित धारणाओं पर सवाल उठाने का साहस किया। ऐसे ही निडर विचारकों में एक नाम है — चार्वाक। जब भी चार्वाक या लोकायत दर्शन की बात होती है, तो सबसे पहले एक प्रसिद्ध पंक्ति याद आती है— "यावज्जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्।" अर्थात् — जब तक जियो, सुख से जियो; चाहे कर्ज लेकर ही घी क्यों न पीना पड़े। लेकिन क्या चार्वाक का दर्शन केवल सुख और भोग की बात करता था? क्या वे सिर्फ ईश्वर, धर्म और परलोक का विरोध कर रहे थे? या फिर वे लोगों को बिना सोचे-समझे किसी बात पर विश्वास करने के बजाय अपनी बुद्धि और विवेक का उपयोग करना सिखा रहे थे? लगभग ढाई हज़ार वर्ष पहले, जब समाज में स्वर्ग-नरक, कर्मकांड, पुनर्जन्म और अनेक धार्मिक मान्यताओं को बिना प्रश्न किए स्वीकार कर लिया जाता था, तब चार्वाक ने लोगों से कहा— "किसी बात को केवल इसलिए सच मत मानो क्योंकि लोग उसे लंबे समय से मानते आ रहे हैं। उसे अपने अनुभव, ...