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सह्याद्रि के देव ज्योतिबा: जानिए शिव के इस अनूठे स्वरूप का सच

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महाराष्ट्र के लोकदैवत : भगवान ज्योतिबा और आई अंबाबाई की कहानी  प्रस्तावना — गुलाल से रंगी ज्योतिबा की पहाड़ी महाराष्ट्र के कोल्हापुर से लगभग 18 किलोमीटर दूर स्थित रत्नागिरी पहाड़ी भगवान ज्योतिबा की प्रसिद्ध तीर्थस्थली है। लोकमान्यता में इसे वाडी रत्नागिरी या ज्योतिबा की पहाड़ी भी कहा जाता है। पहाड़ी पर स्थित ज्योतिबा मंदिर महाराष्ट्र की लोकआस्था और धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब कोल्हासुर, रक्ताक्ष और रत्नासुर जैसे असुरों के अत्याचार से प्रजा परेशान थी, तब महालक्ष्मी की सहायता के लिए भगवान शिव के तेज से केदारेश्वर, अर्थात ज्योतिबा का प्राकट्य हुआ। रत्नासुर के वध से इस क्षेत्र का संबंध रत्नागिरी नाम से जोड़ा जाता है। ज्योतिबा की भक्ति का सबसे अनोखा रूप चैत्र पूर्णिमा की यात्रा में दिखाई देता है। हजारों श्रद्धालुओं के जयघोष और उड़ते गुलाल से पूरी पहाड़ी गुलाबी रंग में रंग जाती है। विशाल सासन काठियाँ इस यात्रा को और विशेष बनाती हैं। महाराष्ट्र के लोकजीवन में ज्योतिबा केवल एक पूज्य देवता नहीं, बल्कि कुलदैवत, रक्षक और लोकआस्था के प्रतीक के रूप में ...

हनुमान अंश माने जाने वाले नीम करोली बाबा की जीवनगाथा

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  नीम करोली बाबा: जीवन, भक्ति, सेवा और कैंची धाम की कहानी प्रस्तावना — कैंची धाम के संत नीम करोली बाबा उत्तराखंड की शांत और हरी-भरी पहाड़ियों के बीच, शिप्रा नदी के किनारे बसा कैंची धाम आज भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के अनेक लोगों के लिए आस्था और आध्यात्मिक शांति का महत्वपूर्ण केंद्र है। वर्ष 1964 में हनुमान मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के बाद इस स्थान की पहचान और भी मजबूत हुई। कैंची धाम का नाम आते ही जिस संत की स्मृति सबसे पहले आती है, वे हैं नीम करोली बाबा, जिन्हें उनके भक्त प्रेम से महाराज जी कहते थे। बाबा का जीवन बाहर से बेहद साधारण दिखाई देता था। साधारण कंबल, सहज मुस्कान और हर व्यक्ति के प्रति प्रेम उनके व्यक्तित्व की पहचान थे। वे हनुमान जी के अनन्य भक्त थे और उनके अनेक भक्त उन्हें हनुमान जी का स्वरूप या अवतार मानते हैं। उनकी शिक्षाओं का केंद्र कठिन साधना या जटिल दर्शन से अधिक प्रेम, सेवा, भक्ति और मानवता था। समय के साथ बाबा की प्रसिद्धि भारत से बाहर भी पहुँची। रिचर्ड अल्पर्ट, जिन्हें बाद में राम दास के नाम से जाना गया, के माध्यम से उनकी शिक्षाओं को पश्चिमी दुनिया में पहचान मिली। बा...

छत्रपति शिवाजी महाराज: हिंदवी स्वराज्य के महानायक

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शिवनेरी से रायगढ़ तक हिंदवी स्वराज्य का स्वर्णिम इतिहास प्रस्तावना — एक बालक से छत्रपति तक सत्रहवीं शताब्दी का दक्कन राजनीतिक संघर्षों से घिरा हुआ था। अहमदनगर की निजामशाही, बीजापुर की आदिलशाही और दक्षिण की ओर बढ़ता मुगल साम्राज्य—इन शक्तियों के संघर्ष का सबसे बड़ा भार किसानों और आम जनता को उठाना पड़ता था। इसी अशांत समय में सह्याद्रि की गोद में स्थित शिवनेरी दुर्ग पर एक बालक का जन्म हुआ—शिवाजी भोसले। माता जीजाबाई के संस्कार और पिता शाहजी राजे की सैन्य-राजनीतिक विरासत के बीच पले इस बालक ने आगे चलकर केवल एक राज्य नहीं बनाया, बल्कि स्वराज्य की ऐसी कल्पना को आकार दिया जिसने इतिहास की दिशा बदल दी। तोरणा से शुरू हुआ किलों का अभियान प्रतापगढ़, पन्हाळा, सिंहगढ़ और रायगढ़ तक पहुँचा। अफजल खान से संघर्ष, पावनखिंड में बाजीप्रभु का बलिदान, तानाजी का सिंहगढ़ अभियान, शाहिस्तेखान पर हमला, आगरा से निकलने की घटना और 1674 का राज्याभिषेक—ये सभी उनकी महान यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव बने। लेकिन शिवाजी महाराज की गाथा केवल उनकी अपनी नहीं थी। जीजाबाई, शाहजी, तानाजी, बाजीप्रभु, मुरारबाजी, प्रतापराव गुजर, हंबीरराव...