असरानी बायोग्राफी: 'शोले' के जेलर से लेकर 350 फिल्मों तक का सफर | Asrani Biography in Hindi
असरानी: ‘शोले’ के जेलर से कहीं आगे की कहानी | संघर्ष, प्रेम, दोस्ती और अभिनय के कई रंग
प्रस्तावना
हिंदी सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जिन्हें किसी एक किरदार से इतनी बड़ी पहचान मिलती है कि दर्शक उन्हें उसी किरदार के नाम से याद करने लगते हैं। लेकिन उस एक भूमिका के पीछे छिपी उनकी पूरी जिंदगी और अभिनय यात्रा उससे कहीं ज्यादा बड़ी होती है।
गोवर्धन ठाकुरदास असरानी, जिन्हें सिनेमा प्रेमी प्यार से असरानी के नाम से जानते हैं, ऐसे ही कलाकार थे।
“हम अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर हैं!”
‘शोले’ में बोला गया यह संवाद असरानी को भारतीय सिनेमा की यादों में हमेशा के लिए दर्ज कर गया। खाकी वर्दी, मूंछें, तनी हुई चाल, चेहरे पर अकड़ और संवाद बोलने का अनोखा अंदाज—आज भी इस किरदार को याद करते ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती है।
लेकिन सवाल है—क्या असरानी सिर्फ ‘शोले’ के जेलर थे?
बिल्कुल नहीं।
जयपुर के एक मध्यमवर्गीय परिवार से निकलकर मुंबई पहुंचे इस युवक का सपना केवल कॉमेडियन बनने का नहीं था। वे अभिनेता बनना चाहते थे। कभी नायक बनने का सपना देखते थे और अपने अभिनय को लगातार नए रूप में आजमाना चाहते थे।
रंगमंच और रेडियो से शुरुआत, अभिनय का प्रशिक्षण, छोटे किरदार, गंभीर भूमिकाएं, नकारात्मक किरदार, कॉमेडी, निर्देशन और फिर कई पीढ़ियों के दर्शकों को हंसाने का लंबा सफर—असरानी की कहानी अभिनय के अनगिनत रंगों से भरी हुई है।
उनका सफर केवल हंसी की कहानी नहीं था।
यह संघर्ष, सपनों, दोस्ती, प्रेम, मेहनत और अभिनय को लगातार नए तरीके से जीने की कहानी थी।
जयपुर से शुरू हुआ अभिनय का सपना
गोवर्धन ठाकुरदास असरानी का जन्म जयपुर के एक सिंधी परिवार में हुआ था। विभाजन के बाद उनका परिवार सिंध से आकर जयपुर में बस गया था। उनके पिता कारोबार करते थे और परिवार का माहौल सामान्य मध्यमवर्गीय था।
लेकिन असरानी का मन पारिवारिक कारोबार में नहीं लगता था। उनके भीतर अभिनेता बनने का सपना धीरे-धीरे मजबूत होता जा रहा था।
कॉलेज के दिनों में उनका झुकाव रंगमंच की ओर बढ़ा। उन्होंने नाटकों में अभिनय किया और ऑल इंडिया रेडियो, जयपुर से भी जुड़े। रेडियो के लिए आवाज देने के अनुभव ने उन्हें संवाद, आवाज और प्रस्तुति की दुनिया से और करीब से परिचित कराया।
उन्होंने राजस्थान कॉलेज से पढ़ाई पूरी की, लेकिन उनका मन नौकरी या कारोबार में नहीं था।
उन्हें कैमरे और मंच की दुनिया बुला रही थी।
इसी जद्दोजहद में अभिनेता बनने का सपना लेकर वे मुंबई पहुंच गए।
मुंबई पहुंचकर शुरू हुआ असली संघर्ष
मुंबई उस समय भी सपनों की नगरी थी।
असरानी भी आंखों में सपने लेकर मुंबई पहुंचे, लेकिन जल्द ही उन्हें समझ में आ गया कि केवल प्रतिभा और सपना काफी नहीं है। अभिनय को गंभीरता से सीखना और खुद को लगातार साबित करना भी जरूरी है।
काम की तलाश, छोटे अवसर और स्टूडियो के चक्कर उनके संघर्ष का हिस्सा बने।
1960 से 1962 के बीच उन्होंने साहित्य कलभाई ठक्कर से अभिनय सीखा। इसके बाद 1962 में वे मुंबई आए और अभिनय के अवसर तलाशने लगे। 1963 में किशोर साहू और ऋषिकेश मुखर्जी से मुलाकात हुई। दोनों ने उन्हें अभिनय को पेशेवर तरीके से सीखने की सलाह दी।
यह सलाह उनके जीवन की दिशा बदलने वाली साबित हुई।
असरानी पुणे पहुंचे और Film and Television Institute of India (FTII) में दाखिला लिया।
FTII ने संवारा अभिनेता असरानी को
1964 में FTII में दाखिला लेने के बाद असरानी ने 1966 में अपना अभिनय प्रशिक्षण पूरा किया। वे संस्थान के शुरुआती दौर के प्रमुख छात्रों में गिने जाते थे।
FTII उनके जीवन का बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव था।
यहां उन्होंने अभिनय को केवल संवाद बोलने की कला नहीं, बल्कि एक अनुशासन के रूप में समझा। आवाज, चेहरे के भाव, शरीर की भाषा, संवाद की गति और किरदार की मानसिकता—इन सभी बारीकियों पर उन्होंने काम किया।
उन्हें महान फिल्मकार ऋत्विक घटक के साथ काम करने का अवसर भी मिला। FTII में घटक की स्टाफ फिल्म ‘Fear’ से जुड़ना उनके प्रशिक्षण के महत्वपूर्ण अनुभवों में रहा।
लेकिन FTII की यादें केवल प्रशिक्षण तक सीमित नहीं थीं।
यही वह दौर था, जहां आगे चलकर भारतीय सिनेमा के कई बड़े नाम दिखाई दे रहे थे।
जया भादुड़ी थीं असरानी की जूनियर
FTII में असरानी से जूनियर कलाकारों में जया भादुड़ी भी थीं, जो आगे चलकर जया बच्चन के नाम से प्रसिद्ध हुईं।
असरानी उनसे सीनियर थे और जया उन्हें सम्मान से ‘सर’ कहकर पुकारती थीं।
समय बदला।
जो दो कलाकार कभी संस्थान में सीनियर-जूनियर हुआ करते थे, वे आगे चलकर सहकर्मी बने।
‘गुड्डी’, ‘बावर्ची’, ‘अभिमान’ और ‘चुपके चुपके’ जैसी फिल्मों में दोनों साथ दिखाई दिए।
यह अपने आप में हिंदी सिनेमा के इतिहास का एक दिलचस्प अध्याय है।
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FTII: एक दौर, कई दिग्गज सितारे
जब असरानी FTII के शुरुआती बैच में अपने अभिनय का प्रशिक्षण पूरा कर रहे थे, उसी दौर में सुभाष घई और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नाम भी संस्थान से जुड़े हुए थे। सुभाष घई आगे चलकर प्रसिद्ध निर्देशक बने, जबकि शत्रुघ्न सिन्हा हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय अभिनेता और बाद में राजनेता बने।
इसके बाद के बैचों में पेंटल, शक्ति कपूर, नसीरुद्दीन शाह, शबाना आज़मी, ओम पुरी, मिथुन चक्रवर्ती, डैनी डेन्जोंगपा और रज़ा मुराद जैसे दिग्गज कलाकार भी FTII का हिस्सा बने।
इस तरह FTII का वह दौर भारतीय सिनेमा की ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहा था, जिसने आगे चलकर फिल्म जगत को कई बड़े नाम दिए।
फिल्मों में पहला कदम: ‘खोटा पैसा’ से ‘हरे कांच की चूड़ियाँ’ तक
असरानी के शुरुआती फिल्मी सफर में 1958 की ‘खोटा पैसा’ का उल्लेख मिलता है। फिल्म के निर्देशक एम. सादिक थे और इसमें जॉनी वॉकर तथा श्यामा प्रमुख भूमिकाओं में थे। हालांकि मुख्य कास्ट सूची में असरानी का नाम स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं था।
यह कोई बड़ी शुरुआत नहीं थी, लेकिन उस समय के युवा असरानी के लिए यह फिल्मी दुनिया को करीब से देखने का अवसर था।
इसके बाद 1967 में ‘हरे कांच की चूड़ियाँ’ आई। फिल्म का निर्देशन, निर्माण और लेखन किशोर साहू ने किया था। इसमें असरानी नेअभिनेता बिस्वजीत के मित्र त्रिपाठी की भूमिका निभाई।
इसी दौर में उन्होंने गुजराती फिल्मों में भी काम किया और हिंदी सिनेमा में अपनी जगह बनाने के लिए लगातार संघर्ष करते रहे।
तुरंत बड़ी सफलता नहीं मिली।
लेकिन असरानी रुके नहीं।
धीरे-धीरे फिल्मकारों की नजर इस युवा अभिनेता की प्रतिभा पर पड़ने लगी।
इनमें सबसे महत्वपूर्ण नाम था—
ऋषिकेश मुखर्जी।
ऋषिकेश मुखर्जी ने पहचानी असरानी की असली क्षमता
असरानी के करियर में ऋषिकेश मुखर्जी का योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा।
‘सत्यकाम’, ‘गुड्डी’, ‘बावर्ची’, ‘अभिमान’, ‘नमक हराम’, ‘चुपके चुपके’, ‘मिली’, ‘चैताली’, ‘आलाप’ और ‘जुर्माना’ जैसी फिल्मों में उन्हें अलग-अलग रंग के किरदार निभाने का अवसर मिला।
‘सत्यकाम’ ने उन्हें हिंदी फिल्मों में पहचान की दिशा में आगे बढ़ाया और ‘गुड्डी’ के बाद उनकी मौजूदगी दर्शकों और फिल्मकारों को ज्यादा दिखाई देने लगी।
ऋषिकेश मुखर्जी का सिनेमा आम आदमी और रोजमर्रा की जिंदगी के करीब था। इसलिए असरानी को केवल हंसाने के लिए नहीं, बल्कि एक अभिनेता के रूप में अपनी क्षमता दिखाने का अवसर मिला।
यहीं से साफ होने लगा कि असरानी के भीतर केवल एक कॉमेडियन नहीं, बल्कि एक गंभीर और बहुरंगी अभिनेता भी मौजूद है।
गुलजार के साथ सामने आया असरानी का दूसरा चेहरा
निर्देशक गुलजार भी उन फिल्मकारों में थे, जिन्होंने असरानी की अभिनय क्षमता को समझा।
‘मेरे अपने’ — भटकी हुई युवा पीढ़ी
1971 की फ़िल्म ‘मेरे अपने’ में असरानी ने एक बेरोजगार और दिशाहीन युवा का किरदार निभाया।
दोस्तों के साथ समय बिताते हुए यह युवा अपनी ऊर्जा गुटबाजी और बेकार की गतिविधियों में गंवा रहा है।
लेकिन जब मीना कुमारी का ‘आनंदी अम्मा’ का किरदार इन युवाओं की जिंदगी में आता है, तो उनके जीवन में बदलाव शुरू होता है। असरानी का किरदार भी इस बदलाव का हिस्सा बनता है।
यह भूमिका उनकी कॉमिक छवि से बिल्कुल अलग थी।
‘कोशिश’ — असरानी का गंभीर और नकारात्मक चेहरा
1972 की फ़िल्म ‘कोशिश’ में असरानी ने जया भादुड़ी के भाई कन्हैया का नकारात्मक किरदार निभाया।
कन्हैया स्वार्थी और लालची है। वह अपनी दिव्यांग बहन और जीजा हरिचरण की मजबूरी का फायदा उठाता है।
असरानी ने इस भूमिका को इतनी गंभीरता से निभाया कि दर्शकों को कलाकार नहीं, बल्कि कन्हैया का स्वार्थी चेहरा दिखाई देने लगा।
कई दर्शकों ने उनसे यह तक कह दिया—कि
“ऐसे नेगेटिव रोल मत किया करो… यह तुम पर बिल्कुल नहीं जँचता।”
लेकिन यही तो अच्छे अभिनेता की सफलता थी।
दर्शक किरदार से नफरत करने लगे थे।
असरानी ने साबित कर दिया कि वे सिर्फ लोगों को हंसाना ही नहीं जानते, बल्कि दर्शकों को किसी किरदार से नफरत भी करवा सकते हैं।
‘तेरी मेहरबानियां’ में भी दिखा गंभीर असरानी
1985 की ‘तेरी मेहरबानियां’ में असरानी ने अमरीश पुरी के जमींदार किरदार के धूर्त और चालाक मुनीम बनवारीलाल की भूमिका निभाई।
यह भी उनकी आम हास्य छवि से अलग किरदार था।
‘चैताली’ और ‘प्रेम नगर’ जैसी फिल्मों में भी उन्होंने गंभीर और नकारात्मक भूमिकाएं निभाईं।
इससे साफ होता है कि असरानी का चेहरा भले ही दर्शकों को हंसी की याद दिलाता था, लेकिन गंभीर भूमिकाओं में भी उनकी पकड़ मजबूत थी।
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‘चुपके चुपके’ का प्रशांत कुमार: गंभीरता से फिर कॉमेडी तक
अब उसी अभिनेता को बिल्कुल अलग अंदाज में देखिए।
ऋषिकेश मुखर्जी की ‘चुपके चुपके’ में असरानी प्रशांत कुमार के किरदार में नजर आए।
धर्मेंद्र और अमिताभ बच्चन के किरदारों के साथ उनकी दोस्ती और संवाद फिल्म के हास्य को और मजेदार बनाते हैं।
यहां असरानी का हास्य सहज था।
चेहरे के भाव, संवाद बोलने का अंदाज और साथी कलाकारों के साथ उनकी टाइमिंग—सब मिलकर हंसी पैदा करते थे।
एक तरफ ‘कोशिश’ का कन्हैया।
दूसरी तरफ ‘चुपके चुपके’ का प्रशांत कुमार।
एक ही अभिनेता, लेकिन दो बिल्कुल अलग चेहरे।
यही असरानी की असली अभिनय क्षमता थी।
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नायक बनने का सपना कभी नहीं छोड़ा
मुंबई आने के समय असरानी का सपना था कि वे नायक बनें।
कॉमेडियन के रूप में प्रसिद्धि मिलने के बाद भी उन्होंने यह सपना पूरी तरह नहीं छोड़ा।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ‘चला मुरारी हीरो बनने’ (1977)।
इस फिल्म में असरानी ने मुख्य भूमिका निभाने के साथ निर्देशन भी किया।
कहानी एक ऐसे युवक की थी, जो फिल्मी दुनिया में हीरो बनने का सपना लेकर मुंबई आता है।
इस कहानी में असरानी के अपने संघर्ष की झलक साफ दिखाई देती है।
जयपुर से मुंबई आए युवक का सपना, फिल्मी दुनिया में जगह बनाने की कोशिश और अपनी पहचान तलाशना—यह कहानी कहीं न कहीं उनके अपने सफर का आईना लगती है।
एक ऐसा कलाकार, जो खुद नायक बनने का सपना लेकर आया था, बाद में दूसरों की फिल्मों में यादगार चरित्र निभाने वाला अभिनेता बन गया।
लेकिन उसने अपने उस सपने को पर्दे पर एक फिल्म के रूप में जरूर जिया।
अभिनय के साथ निर्देशन में भी आजमाया हाथ
असरानी ने खुद को केवल कैमरे के सामने अभिनय तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने निर्देशन में भी अपनी किस्मत आजमाई।
‘चला मुरारी हीरो बनने’ (1977)
असरानी के निर्देशन की शुरुआत इसी फिल्म से हुई। इसमें बिंदिया गोस्वामी मुख्य अभिनेत्री थीं और अरुणा ईरानी भी महत्वपूर्ण भूमिका में नजर आईं। फिल्म में फिल्मी दुनिया के सपनों और संघर्ष को हास्य के साथ पेश किया गया।
‘सलाम मेमसाब’ (1979)
इसके बाद असरानी ने ‘सलाम मेमसाब’ का निर्देशन किया, जिसमें ज़रीना वहाब मुख्य भूमिका में थीं।
‘हम नहीं सुधरेंगे’ (1980)
इस फिल्म में रीता भादुड़ी और मंजू बंसल के साथ असरानी प्रमुख भूमिकाओं में थे। हल्के-फुल्के मनोरंजन को उन्होंने अपनी निर्देशन शैली का हिस्सा बनाया।
‘दिल ही तो है’ (1992)
कई वर्षों बाद असरानी ने ‘दिल ही तो है’ का निर्देशन किया। फिल्म में जैकी श्रॉफ और दिव्या भारती मुख्य भूमिकाओं में थे।
‘उड़ान’ (1997)
1997 में आई ‘उड़ान’ में रेखा केंद्रीय भूमिका में थीं, जबकि सैफ अली खान और मधु भी महत्वपूर्ण भूमिकाओं में नजर आए।
अभिनेता के रूप में अपनी खास कॉमिक टाइमिंग के लिए पहचाने जाने वाले असरानी ने निर्देशन में भी हास्य, भावनाओं और पारिवारिक मनोरंजन को महत्व दिया।
उनकी निर्देशित फिल्मों की संख्या भले कम रही, लेकिन यह दौर उनके बहुआयामी व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा था।
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असरानी: अभिनय, कॉमेडी और निर्देशन ही नहीं, डांस और गायकी के भी उस्ताद
असरानी ने पर्दे पर अपनी कॉमिक अदाकारी के साथ गायकी और डांस का भी शानदार रंग दिखाया। उनकी चुलबुली शैली और अनोखी परफॉर्मेंस ने गीतों को भी यादगार बनाया।
“चला मुरारी हीरो बनने” (1977) में उन्होंने “पाँच रुपए दे दे” और “पिया मैं हूँ पतंग, तू डोर” जैसे गीतों में अपनी आवाज़ दी और पर्दे पर शानदार डांस व कॉमिक अंदाज़ में परफॉर्म किया।
इसके बाद “फूल खिले हैं गुलशन गुलशन” (1978) के “मन्नू भाई मोटर चली पम पम पम” और “सलाम मेमसाब” (1979) के “हम भी हँसते थे कभी” जैसे गीतों में भी उनकी गायकी और डांस ने दर्शकों का खूब मनोरंजन किया।
असरानी का यही बहुआयामी हुनर उन्हें सिर्फ अभिनेता नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा का एक संपूर्ण मनोरंजन कलाकार बनाता है।
मंजू बंसल: पर्दे की साथी से जीवनसंगिनी तक
असरानी की निजी जिंदगी का खूबसूरत अध्याय उनकी पत्नी मंजू बंसल से जुड़ा है।
मंजू खुद अभिनेत्री थीं और बाद में निर्देशन से भी जुड़ीं।
फिल्मी दुनिया में काम करते हुए दोनों की मुलाकात हुई। धीरे-धीरे दोस्ती प्रेम में बदली और दोनों जीवनसाथी बन गए।
दोनों ने ‘आज की ताजा खबर’, ‘नमक हराम’, ‘तपस्या’, ‘चांदी सोना’, ‘चोर सिपाही’, ‘नालायक’, ‘जान-ए-बहार’, ‘जुर्माना’, ‘सरकारी मेहमान’, ‘चला मुरारी हीरो बनने’ और ‘हम नहीं सुधरेंगे’ जैसी फिल्मों में साथ काम किया।
मंजू केवल पर्दे की साथी नहीं थीं।
वे असरानी के लंबे सफर की जीवनसंगिनी भी थीं।
खास बात यह थी कि दोनों की साझेदारी सिर्फ अभिनय तक सीमित नहीं रही। पर्दे पर दोनों साथ दिखाई दिए और कैमरे के पीछे भी असरानी और मंजू बंसल एक-दूसरे का साथ निभाते रहे।
राजेश खन्ना और असरानी: दोस्ती और फिल्मों का साथ
असरानी और राजेश खन्ना के रिश्ते को लेकर अक्सर कहा जाता है कि दोनों ने करीब 25 फिल्मों में साथ काम किया था। लेकिन यह आंकड़ा सही नहीं माना जाता। खुद असरानी ने भी कई मौकों पर इस दावे को गलत बताया था।
दरअसल, दोनों के बीच सिर्फ फिल्मों का रिश्ता नहीं था, बल्कि अच्छी दोस्ती और आत्मीयता भी थी।
‘बावर्ची’ से शुरू हुआ खास साथ
राजेश खन्ना और असरानी का साथ ‘बावर्ची’ (1972) से शुरू हुआ। इसमें असरानी ने शांतिनाथ यानी ‘बाबू’ की भूमिका निभाई थी।
फिल्म की सफलता के साथ दोनों की दोस्ती भी गहरी होती गई और आगे कई फिल्मों में उनकी जोड़ी दिखाई दी।
दोनों की प्रमुख फिल्में
• ‘बावर्ची’ (1972) — शांतिनाथ ‘बाबू’
• ‘नमक हराम’ (1973) — धोंडू/मुरारी
• ‘आप की कसम’ (1974) — डॉ. प्रवीण
• ‘रोटी’ (1974) – रामू
• ‘प्रेम नगर’ (1974)
• ‘अजनबी’ (1974) — चेतन कुमार
• ‘महबूबा’ (1976) — सिप्पी
• ‘अनुरोध’ (1977) — बंशी
• ' मैं आशिक हूँ बहारों का ' (1977) – मुरली
इन फिल्मों में राजेश खन्ना मुख्य आकर्षण थे, लेकिन असरानी ने अपनी छोटी-बड़ी भूमिकाओं को कभी छोटा नहीं होने दिया।
25 फिल्मों का दावा भले ही सही न हो, लेकिन राजेश खन्ना और असरानी का साथ हिंदी सिनेमा की उस खूबसूरत दोस्ती की कहानी जरूर है, जिसमें एक सुपरस्टार और एक मजबूत चरित्र अभिनेता ने पर्दे के साथ-साथ जिंदगी में भी एक-दूसरे का साथ निभाया।
‘आज की ताजा खबर’: कॉमेडी के बड़े सितारे बने असरानी
1973 की सुपरहिट कॉमेडी फिल्म ‘आज की ताजा खबर’, जिसका निर्देशन राजेंद्र भाटिया ने किया था, असरानी के कॉमेडी करियर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव थी।
इसमें उन्होंने चंपक बूमिया का किरदार निभाया।
चंपक एक सीधा-सादा शादीशुदा आदमी है, जिसकी एक छोटी-सी बात आगे चलकर झूठ और गलतफहमियों के ऐसे जाल में बदल जाती है कि वह खुद ही उसमें फंसता चला जाता है।
एक रात क्रिकेट मैच के कारण देर से घर पहुंचने पर पत्नी के गुस्से से बचने के लिए चंपक एक काल्पनिक दोस्त ‘रंजन’ का बहाना बना देता है।
लेकिन कहानी में असली मोड़ तब आता है, जब असली रंजन सामने आ जाता है।
इसके बाद शुरू होती है झूठ, गलतफहमी और हास्यास्पद परिस्थितियों की ऐसी कहानी, जिसमें असरानी के घबराए चेहरे, तेज एक्सप्रेशन और शानदार कॉमिक टाइमिंग ने खूब हंसाया।
इस फिल्म में उनके अभिनय के लिए उन्हें 1974 का Filmfare Best Comedian Award मिला।
यह सम्मान उनके कॉमेडी करियर में बड़ा पड़ाव बना और उन्हें हिंदी सिनेमा के प्रमुख हास्य कलाकारों में स्थापित कर दिया।
लेकिन उनकी सबसे अमर पहचान अभी पर्दे पर आनी बाकी थी।
वह थी—
‘शोले’ का जेलर।
‘शोले’ का जेलर: छोटा किरदार, अमर पहचान
15 अगस्त 1975 को रिलीज हुई ‘शोले’ भारतीय सिनेमा की सबसे यादगार फिल्मों में गिनी जाती है।
फिल्म में अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, संजीव कुमार, हेमा मालिनी और अमजद खान जैसे बड़े कलाकार थे।
इन सभी के बीच असरानी का किरदार छोटा था।
लेकिन उन्होंने उस छोटे से किरदार को ऐसा बना दिया कि वह फिल्म की सबसे यादगार झलकियों में शामिल हो गया।
जेलर की बॉडी लैंग्वेज कहां से आई?
जेलर की बॉडी लैंग्वेज तैयार करते समय असरानी ने एडोल्फ हिटलर की तस्वीरों और सैन्य अंदाज से प्रेरणा ली थी।
भूमिका की तैयारी के लिए उन्होंने हिटलर पर बनी कुछ फिल्मों को भी देखा, जिनमें चार्ली चैपलिन की ‘The Great Dictator’ भी शामिल थी।
लेकिन उन्होंने किसी की सीधी नकल नहीं की।
तनी हुई मुद्रा, हाथों की हरकत, सैन्य अंदाज और आदेश देने की शैली को उन्होंने एक हास्यपूर्ण भारतीय जेलर के व्यक्तित्व में ढाल दिया।
सबसे मजेदार बात यह थी कि जेलर खुद को बिल्कुल भी हास्यास्पद नहीं समझता था।
वह पूरी गंभीरता से आदेश देता था।
हंसी दर्शकों को आती थी।
यही उस किरदार की असली ताकत थी।
“हम अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर हैं!”
और फिर आता है वह संवाद, जिसने असरानी को अमर कर दिया—
“हम अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर हैं!”
आवाज, चेहरे के भाव, शरीर की भाषा और संवाद बोलने का अंदाज—सब कुछ मिलकर यह दृश्य यादगार बन गया।
“आधे इधर जाओ, आधे उधर जाओ…” जैसे प्रसंगों में उनकी टाइमिंग और बोलने का अंदाज आज भी दर्शकों को हंसा देता है।
‘शोले’ की गंभीर कहानी के बीच जेलर दर्शकों के लिए हंसी की एक छोटी-सी खिड़की बन गया।
किरदार छोटा था, लेकिन असर बहुत बड़ा।
यही असरानी की खासियत थी।
‘बालिका बधू’: दोस्ती में मिला ‘शादी का ज्ञान’
1976 की ‘बालिका बधू’ में असरानी ने शरत का मजेदार किरदार निभाया।
शरत खुद को शादीशुदा जिंदगी का बड़ा जानकार समझता है और अपने भोले दोस्त अमल को शादी की रात के तौर-तरीके समझाने लगता है।
असरानी का गंभीर चेहरा, मासूम दोस्त को दिया जा रहा ‘ज्ञान’ और सचिन के भोलेपन से यह पूरा प्रसंग बेहद मजेदार बन जाता है।
यानी शरत दोस्त कम और बिन मांगा सलाहकार ज्यादा नजर आता है!
इस यादगार भूमिका के लिए असरानी को 1977 में Filmfare Best Comedian Award से सम्मानित किया गया।
इस तरह लगातार दो फिल्मों की कॉमेडी भूमिकाओं ने उन्हें हास्य कलाकार के रूप में और मजबूत पहचान दी।
असरानी और अरुणा ईरानी: कॉमेडी की यादगार जुगलबंदी
70 और 80 के दशक में असरानी और अरुणा ईरानी की जोड़ी भी दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय रही।
मुख्य कहानी के साथ चलने वाले हल्के-फुल्के हास्य प्रसंगों में दोनों की नोकझोंक और कॉमिक टाइमिंग खूब जमती थी।
असरानी का घबराया हुआ, बड़बोला या शरारती अंदाज और अरुणा ईरानी का चुलबुला व हाजिरजवाब व्यक्तित्व पर्दे पर शानदार तालमेल बनाता था।
‘चला मुरारी हीरो बनने’ में खास अंदाज
1977 की ‘चला मुरारी हीरो बनने’ में दोनों की केमिस्ट्री खास तौर पर देखने को मिली।
असरानी मुरारी की मुख्य भूमिका में थे और अरुणा ईरानी उनकी प्रेमिका बनी थीं।
इसके अलावा ‘रफू चक्कर’, ‘लैला मजनू’, ‘चरस’, ‘जुदाई’ और ‘घर संसार’ जैसी फिल्मों में भी दोनों साथ दिखाई दिए।
इनकी खासियत सिर्फ हंसी नहीं थी।
पर्दे पर उनके बीच की सहज नोकझोंक और अपनापन उन्हें 70-80 के दशक की यादगार कॉमिक जोड़ियों में शामिल करता है।
कादर खान और असरानी: कॉमेडी की शानदार जोड़ी
80 और 90 के दशक में असरानी ने मसाला फिल्मों की कॉमेडी को भी अपना अलग रंग दिया।
इस दौर में कादर खान और असरानी की जोड़ी खूब पसंद की गई।
कादर खान की भारी आवाज और संवाद अदायगी के सामने असरानी की तेज बॉडी लैंग्वेज, चेहरे के भाव और कॉमिक टाइमिंग अलग ही तालमेल बनाती थी।
दोनों ने ‘हिम्मतवाला’, ' स्वर्ग से सुन्दर ' ‘बाप नंबरी बेटा दस नंबरी’, ‘घर घर की कहानी’, 'प्यार का देवता ', ‘बड़े मियां छोटे मियां’, और 'हसीना मान जाएगी 'जैसी फिल्मों में साथ काम किया।
कादर खान के संवादों की गंभीरता के सामने असरानी अपनी हरकतों और भाव-भंगिमा से हास्य पैदा कर देते थे।
‘तकदीरवाला’ में चित्रगुप्त
1995 की ‘तकदीरवाला’ में असरानी ने हास्यपूर्ण चित्रगुप्त का किरदार निभाया।
फिल्म में कादर खान यमराज बने थे।
दोनों की जोड़ी ने फिल्म में हास्य का अलग रंग भर दिया।
यह भूमिका भी असरानी की उसी खासियत को सामने लाती है—वे किरदार चाहे कितना भी छोटा क्यों न हो, उसमें अपनी पहचान छोड़ देते थे।
उनके लिए कोई भूमिका सिर्फ ‘छोटी’ नहीं थी।
वे उसे अपने अंदाज से यादगार बनाने की कोशिश करते थे।
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गुजराती सिनेमा में असरानी का सुनहरा दौर
हिंदी फिल्मों में कॉमेडी और चरित्र भूमिकाओं के लिए मशहूर असरानी ने 1970 के दशक के आखिर और 1980 के दशक में गुजराती सिनेमा में भी लंबा और सफल दौर देखा।
यहां उन्हें मुख्य नायक, सह-नायक और निर्देशक के रूप में काम करने का मौका मिला।
गुजराती फिल्मों में बने नायक
हिंदी फिल्मों के विपरीत गुजराती सिनेमा में असरानी को मुख्य अभिनेता के रूप में खूब प्यार मिला।
उनकी प्रमुख फिल्मों में—
• ‘मोटा घरनी वहू’ (1978)
• ‘सो दहाड़ा सासुना तो एक दहाड़ो वहूनो’ (1980)
• ‘ववा विरामगाम’ (1980)
• ‘वहता आंसू वहूना’ (1981)
• ‘खरा खरी नो खेल’ (1982)
• ‘जुगल जोड़ी’ (1982)
• ‘हीरो घोघे जई आव्यो’
• ‘पारका पोताना’
• ‘शु करीशु’ (2016)
शामिल हैं।
‘अमदावादी रिक्शावालो’ की यादगार भूमिका
‘अमदावादी रिक्शावालो’ (1980) में असरानी ने एक साधारण रिक्शाचालक की मुख्य भूमिका निभाई।
आम आदमी के संघर्ष से जुड़ा उनका किरदार दर्शकों को बेहद पसंद आया।
‘घर संसार’ और ‘सात कैदी’
गुजराती पारिवारिक फिल्म ‘घर संसार’ में उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई, जबकि ‘सात कैदी’ (1986) में वे अरविंद त्रिवेदी और रीता भादुड़ी के साथ नजर आए।
इस फिल्म में उनका अंदाज पहले से कहीं अधिक गंभीर था।
गुजराती सिनेमा ने असरानी के उस रूप को सामने रखा, जिसमें वे सिर्फ कॉमेडियन नहीं, बल्कि एक सफल नायक और संजीदा अभिनेता भी थे।
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पंजाबी सिनेमा में भी छाया असरानी का अंदाज
हिंदी और गुजराती फिल्मों के साथ असरानी ने पंजाबी सिनेमा में भी अपने हास्य और सहज अभिनय से दर्शकों का मनोरंजन किया।
खासकर 1970 और 1980 के दशक में उनकी कई पंजाबी फिल्मों में यादगार भूमिकाएं देखने को मिलीं।
शुरुआती दौर की पंजाबी फिल्में
असरानी ‘तेरी मेरी इक जिंदड़ी’ (1975), ‘संतो बंतो’ (1976), ‘जिंदड़ी यार दी’ (1978) और ‘दामन मुटियारां दा’ जैसी फिल्मों में नजर आए।
‘पटोला’ में कॉमेडी का रंग
1987 की ‘पटोला’ में असरानी ने राज बब्बर, दलजीत कौर और सतीश कौल जैसे कलाकारों के साथ काम किया।
‘यारां नाल बहारां’ में नया अंदाज
2005 में मनमोहन सिंह निर्देशित ‘यारां नाल बहारां’ में असरानी ने एक मजेदार कॉमिक किरदार निभाया।
‘यारियां’ में डॉ. पाल्टा
2008 की पंजाबी फिल्म ‘यारियां’ में उन्होंने डॉ. पाल्टा का खास और मनोरंजक किरदार निभाया।
पंजाबी फिल्मों में उन्होंने हिंदी सिनेमा जितना काम भले न किया हो, लेकिन अपनी कॉमिक टाइमिंग और सहज संवाद अदायगी से यहां भी अपनी पहचान बनाई।
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छोटे पर्दे पर असरानी की यादगार भूमिकाएं
फिल्मों में अपनी कॉमेडी से पहचान बनाने वाले असरानी ने टीवी और वेब सीरीज में भी कई अलग-अलग किरदार निभाए।
उन्होंने पौराणिक, ऐतिहासिक, हास्य और गंभीर भूमिकाओं में अपनी छाप छोड़ी।
‘नटखट नारद’ — देवर्षि नारद
1985 के दूरदर्शन धारावाहिक ‘नटखट नारद’ में असरानी ने देवर्षि नारद की मुख्य भूमिका निभाई।
उनका चुलबुला अंदाज दर्शकों को खूब पसंद आया।
‘एक से बढ़कर एक’ — मजेदार भूत
1995 के डीडी नेशनल के कॉमेडी शो ‘एक से बढ़कर एक’ में उन्होंने ‘राजा’ नाम के भूत का हास्यपूर्ण किरदार निभाया।
‘युग’ — गंभीर अभिनय
1996 के ऐतिहासिक धारावाहिक ‘युग’ में असरानी ने स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अपनी गंभीर अभिनय क्षमता दिखाई।
‘घर जमाई’ — कॉमेडी का रंग
1997 के ज़ी टीवी के लोकप्रिय शो ‘घर जमाई’ में उन्होंने हास्य भूमिका निभाई।
‘प्रिंसेस डॉली…’ — जादुई दुनिया
2004-05 के स्टार प्लस शो ‘प्रिंसेस डॉली और उसका मैजिक बैग’ में असरानी जादुई किरदार में नजर आए।
‘पार्टनर्स’ — कमिश्नर गोगोई
2017 के सब टीवी शो ‘पार्टनर्स: ट्रबल हो गई डबल’ में उन्होंने सीनियर पुलिस अधिकारी कमिश्नर किशोर गोगोई का मजेदार किरदार निभाया।
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वेब सीरीज में भी कायम रहा असर
बदलते दौर के साथ असरानी ने वेब सीरीज में भी काम किया।
‘परमानेंट रूममेट्स’ — प्यारे दादाजी
‘परमानेंट रूममेट्स’ के सीजन 2 और 3 में असरानी ने सुभाष चौधरी यानी दादाजी की भूमिका निभाई।
उनका सहज और मजेदार अंदाज नई पीढ़ी के दर्शकों को भी पसंद आया।
‘ब्लडी ब्रदर्स’ — रहस्यमय किरदार
2022 की ‘ब्लडी ब्रदर्स’ में उन्होंने सैमुअल अल्वारेज़ की भूमिका निभाई।
इस बार उनका अंदाज हास्य से अलग और रहस्य से जुड़ा हुआ था।
यही असरानी की खासियत थी—पर्दा छोटा हो या बड़ा, किरदार हास्य का हो या गंभीर, वे अपनी मौजूदगी से उसे यादगार बना देते थे।
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असरानी को मिले प्रमुख सम्मान
असरानी ने अपने लंबे फिल्मी सफर में कॉमेडी के साथ गंभीर अभिनय और निर्देशन में भी अपनी प्रतिभा दिखाई।
फ़िल्मफ़ेयर के दो बड़े पुरस्कार
असरानी को सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार दो बार मिला—
• 1974 — ‘आज की ताज़ा खबर’ — चंपक बूमिया
• 1977 — ‘बालिका बधू’ — शरत
अन्य प्रमुख सम्मान
• 1973 — शमा-सुषमा पुरस्कार: ‘अनहोनी’ के लिए सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता
• गुजरात राज्य फ़िल्म पुरस्कार: ‘सात कैदी’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और निर्देशक का सम्मान
फ़िल्मफ़ेयर में कई नामांकन
असरानी को 11 से अधिक बार फ़िल्मफ़ेयर में हास्य और सहायक अभिनेता की श्रेणियों में नामांकन मिला।
इनमें ‘अभिमान’, ‘बिदाई’, ‘रफ़ू चक्कर’, ‘शोले’, ‘छोटी सी बात’ और ‘पति पत्नी और वो’ जैसी चर्चित फिल्में शामिल हैं।
लेकिन पुरस्कारों से बड़ी उपलब्धि वह प्यार था, जो दर्शकों ने उन्हें दशकों तक दिया।
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असरानी की कुछ यादगार फिल्में
असरानी का फिल्मी सफर कई दशकों तक चला।
1970 का दशक
• ‘गुड्डी’ — 1971
•;‘मेरे अपने’ — 1971
• ‘बावर्ची’ — 1972
• ‘कोशिश’ — 1972
• ‘अभिमान’ — 1973
• ‘आज की ताजा खबर’ — 1973
• ‘चुपके चुपके’ — 1975
• ‘शोले’ — 1975
• ‘रफू चक्कर’ — 1975
• ‘बालिका बधू’ — 1976
• ‘छोटी सी बात’ — 1976
• ‘चला मुरारी हीरो बनने’ — 1977
इसके बाद ‘नमक हराम’, ‘हिम्मतवाला’, ‘स्वर्ग से सुन्दर’, फकीरा, कामचोर, ‘शराबी’, ‘बीवी हो तो ऐसी’, ‘बाप नंबरी बेटा दस नंबरी’, ‘चांडाल’, ‘जो जीता वही सिकंदर’ और ‘बड़े मियां छोटे मियां’ जैसी फिल्मों में भी उन्होंने अपनी पहचान बनाए रखी।
2000 के दशक में उन्होंने नई पीढ़ी के दर्शकों के बीच भी अपनी जगह बनाए रखी। ‘हेरा फेरी’, ‘आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया’, ‘चुप चुप के’, ‘गरम मसाला’, ‘मालामाल वीकली’ और ‘भागम भाग’ जैसी फिल्मों में वे नजर आए।
इसके बाद ‘खट्टा मीठा’, ‘दे दना दन’ और ‘बोल बच्चन’ जैसी फिल्मों में भी उनका अभिनय देखने को मिला।
पांच दशक से ज्यादा लंबे करियर में उन्होंने 350 से अधिक फिल्मों में काम किया।
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बदलता बॉलीवुड, बदलते किरदार
70 के दशक का सिनेमा अलग था।
80 और 90 के दशक में मसाला फिल्मों का दौर आया।
2000 के बाद कॉमेडी का अंदाज बदला और फिल्मों की भाषा भी बदलने लगी।
लेकिन असरानी हर दौर में दिखाई दिए।
नई पीढ़ी के कलाकारों के साथ काम किया, नए तरह के किरदार निभाए और उम्र के साथ अपनी भूमिकाएं बदलीं।
‘हेरा फेरी’, ‘आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया’,‘चुप चुप के’, ‘गरम मसाला’, ' धमाल ' और बाद में ‘बोल बच्चन’ जैसी फिल्मों में उनकी मौजूदगी ने साबित किया कि वे किसी एक दौर के कलाकार नहीं थे।
युवा अभिनेता से कॉमेडियन और फिर चरित्र अभिनेता तक का यह सफर आसान नहीं था।
लेकिन असरानी ने बदलते सिनेमा के साथ खुद को ढाल लिया।
20 अक्टूबर 2025: एक हंसी हमेशा के लिए खामोश हो गई
20 अक्टूबर 2025 को 84 वर्ष की उम्र में असरानी का मुंबई में निधन हो गया। यह वह समय था, जब देशभर में लोग दीपावली की खुशियां मना रहे थे। घर-घर दीप जल रहे थे, लोग अपनों के साथ त्योहार की खुशी बांट रहे थे और उसी दिन हिंदी सिनेमा का यह चहेता कलाकार इस दुनिया से विदा हो गया।
बताया जाता है कि असरानी लंबे समय से सांस संबंधी बीमारी से जूझ रहे थे। अपने अंतिम समय में भी उन्होंने कथित तौर पर परिवार से कहा था कि उनके निधन की खबर तुरंत सार्वजनिक न की जाए। वे चाहते थे कि अंतिम संस्कार बेहद सादगी से हो, किसी तरह का दिखावा या तामझाम न किया जाए और सभी अंतिम रस्में पूरी होने के बाद ही मीडिया को इसकी जानकारी दी जाए।
यह उनकी सादगी और निजी जीवन को लेकर उनके स्वभाव की एक झलक भी दिखाता है।
उनके निधन की खबर ने हिंदी सिनेमा के उस दौर की एक और महत्वपूर्ण कड़ी को हमसे दूर कर दिया, जिसने कई पीढ़ियों को हंसाया था।
लेकिन उनके जाने की विडंबना देखिए—जब लोग दीपावली के उजाले और खुशियों में डूबे थे, उसी दिन पर्दे का वह कलाकार हमेशा के लिए खामोश हो गया, जिसकी हंसी ने दशकों तक लोगों के जीवन में रोशनी भरी थी।
और फिर जब कभी टीवी पर ‘शोले’ चलती है, वही जेलर अचानक फिर हमारे सामने आ खड़ा होता है।
खाकी वर्दी।
तनी हुई चाल।
चेहरे पर अकड़।
और वह आवाज—
“हम अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर हैं!”
लगभग पांच दशक पहले निभाया गया यह किरदार आज भी लोगों की बातचीत और यादों में जीवित है।
यही किसी कलाकार की सबसे बड़ी जीत होती है—वह चला जाता है, लेकिन उसके किरदार और उसकी हंसी लोगों के बीच हमेशा जीवित रहते हैं।
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असरानी की असली विरासत क्या है?
अगर पूछा जाए कि असरानी की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या थी?
क्या वह ‘शोले’ का जेलर था?
क्या वह दो फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार थे?
क्या वह सैकड़ों फिल्मों में काम करना था?
या फिर निर्देशन में हाथ आजमाना?
शायद इन सभी सवालों का जवाब हां है।
लेकिन उनकी सबसे बड़ी विरासत शायद इससे भी बड़ी थी—
उन्होंने लोगों को हंसाया।
वे ‘मेरे अपने’ में भटके हुए युवा थे।
‘कोशिश’ में स्वार्थी और नकारात्मक कन्हैया थे।
‘चुपके चुपके’ में प्रशांत कुमार बनकर हंसाते थे।
‘तेरी मेहरबानियां’ में गंभीर और चालाक मुनीम बने।
‘तकदीरवाला’ में चित्रगुप्त बने।
‘चला मुरारी हीरो बनने’ में नायक बने और निर्देशन भी किया।
‘आज की ताजा खबर’ में चंपक बनकर दर्शकों को हंसाया।
‘बालिका बधू’ में शरत बनकर अपनी कॉमिक टाइमिंग दिखाई।
और फिर ‘शोले’ के जेलर के रूप में हमेशा के लिए अमर हो गए।
इसलिए असरानी को केवल कॉमेडियन कहना उनके विशाल अभिनय संसार को छोटा कर देना होगा।
वे एक ऐसे अभिनेता थे, जिसने कॉमेडी को अपनी पहचान जरूर बनाया, लेकिन अपनी प्रतिभा को कभी सिर्फ कॉमेडी तक सीमित नहीं किया।
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अंतिम बात: जेलर से आगे भी एक पूरी कहानी
जयपुर से निकलकर अभिनय का सपना देखने वाला एक युवक मुंबई आया।
उसने संघर्ष किया।
रंगमंच और रेडियो से जुड़ा।
अभिनय सीखा।
FTII में प्रशिक्षण लिया।
छोटे किरदार निभाए।
गंभीर भूमिकाएं कीं।
नकारात्मक किरदार निभाए।
कॉमेडी की।
नायक बनने की कोशिश की।
निर्देशन किया।
गुजराती सिनेमा में काम किया।
पंजाबी फिल्मों में अपनी पहचान बनाई।
जया भादुड़ी जैसी कलाकारों के साथ FTII का दौर साझा किया।
सुभाष घई और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नामों के साथ उसी संस्थान की यादें जुड़ीं।
ऋषिकेश मुखर्जी और गुलजार जैसे फिल्मकारों ने उनके अभिनय के अलग-अलग रंग दर्शकों के सामने रखे।
राजेश खन्ना जैसे सुपरस्टार के साथ फिल्मों में काम किया और उनसे दोस्ती का रिश्ता बनाया।
मंजू बंसल के साथ पर्दे की साझेदारी को जीवन की साझेदारी में बदला।
अरुणा ईरानी के साथ यादगार कॉमेडी की।
कादर खान के साथ ऐसी जोड़ी बनाई, जिसे 80 और 90 के दशक का दर्शक आज भी याद करता है।
और फिर ‘शोले’ के जेलर के रूप में ऐसा किरदार दिया, जिसे भारतीय सिनेमा शायद कभी भूल नहीं पाएगा।
इसलिए असरानी को याद करते हुए सिर्फ यह कहना पर्याप्त नहीं कि—
“हम अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर हैं!”
क्योंकि उस संवाद के पीछे एक ऐसा कलाकार खड़ा था, जिसने अपनी पूरी जिंदगी अभिनय को समर्पित कर दी।
एक ऐसा कलाकार, जिसे दुनिया ने सबसे ज्यादा हंसते हुए देखा, लेकिन जिसके अभिनय में संघर्ष भी था, गंभीरता भी, प्रेम भी, दोस्ती भी और प्रयोग करने का साहस भी।
असरानी पर्दे से चले गए, लेकिन उनकी हंसी नहीं गई।
जब भी ‘शोले’ का वह जेलर सामने आएगा, ‘चुपके चुपके’ का प्रशांत कुमार याद आएगा और ‘कोशिश’ का कन्हैया उनके अभिनय की गंभीरता की याद दिलाएगा—असरानी फिर हमारे सामने होंगे।
यही सिनेमा की ताकत है।
कलाकार चला जाता है, लेकिन उसके किरदार दर्शकों के दिल में हमेशा जीवित रहते हैं।
और शायद यही असरानी की सबसे खूबसूरत विरासत है—
उन्होंने हमें सिर्फ अभिनय नहीं दिया, उन्होंने हमें हंसने की अनगिनत वजहें दीं।






















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