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हठ और संकल्प में क्या अंतर है? जानिए बाल हठ, त्रिया हठ और राज हठ का रहस्य

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  हठ: जिद, जुनून या संकल्प? जब अड़ने की शक्ति बन गई इतिहास की कहानी मनुष्य के स्वभाव में कुछ भाव ऐसे होते हैं, जो उसके जीवन की दिशा बदल सकते हैं। हठ भी ऐसा ही एक भाव है। जब कोई व्यक्ति अपनी बात या इच्छा से पीछे हटने को तैयार नहीं होता, तो उसे हम हठ कहते हैं। कभी यह बच्चे की मासूम जिद के रूप में दिखाई देता है, कभी किसी राजा के निर्णय में और कभी किसी बड़े उद्देश्य के लिए किए गए अटूट प्रयास में। लेकिन क्या हर हठ बुरा होता है? शायद नहीं। क्योंकि हठ की असली पहचान उसके अड़ने में नहीं, बल्कि उसकी दिशा में छिपी होती है। यदि व्यक्ति केवल अपनी बात मनवाने के लिए सही-गलत की परवाह किए बिना अड़ जाए, तो वही हठ दुराग्रह बन जाता है। लेकिन जब कोई सत्य, कर्तव्य, प्रेम, भक्ति या किसी महान उद्देश्य के लिए कठिनाइयों के बावजूद डटा रहता है, तो वही अडिगता संकल्प बन जाती है। भारतीय लोकपरंपरा में हठ के तीन प्रसिद्ध रूप बताए जाते हैं—बाल हठ, त्रिया हठ और राज हठ। रामायण, महाभारत और पुराणों की अनेक कथाओं में इनके अलग-अलग रूप दिखाई देते हैं। कहीं हठ ने परिवार और राज्य को संकट में डाल दिया, तो कहीं उसी अडिगता ने ...

वेदों की वो महान विदुषियाँ, जिन्हें इतिहास भूल गया | Vedic Women Scholars of Ancient India

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  जब प्राचीन भारत की स्त्रियों ने ज्ञान, दर्शन और शास्त्रार्थ में अपनी आवाज दर्ज की प्रस्तावना — जब ज्ञान पर किसी एक का अधिकार नहीं था कल्पना कीजिए एक प्राचीन सभा की। चारों ओर विद्वान बैठे हैं। कहीं यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित है, कहीं मंत्रों का उच्चारण हो रहा है और कहीं जीवन, आत्मा तथा ब्रह्मांड के रहस्यों पर गंभीर चर्चा चल रही है। अचानक सभा में एक स्त्री उठती है। वह किसी से अनुमति लेकर केवल अपनी बात कहने नहीं आई। उसके मन में प्रश्न है। वह पूछती है। फिर दूसरा प्रश्न करती है। और उसका प्रश्न धीरे-धीरे मनुष्य के जीवन से निकलकर पूरे ब्रह्मांड के अंतिम आधार तक पहुँच जाता है। यह स्त्री है—गार्गी वाचक्नवी। लेकिन गार्गी अकेली नहीं थीं। एक दूसरी स्त्री धन-संपत्ति के सामने खड़ी होकर पूछती है—यदि धन मुझे अमरत्व नहीं दे सकता, तो मैं उसका क्या करूँ? वह हैं—मैत्रेयी। कहीं लोपामुद्रा अपने पति अगस्त्य से जीवन और गृहस्थ धर्म के बारे में संवाद करती हैं। कहीं घोषा अपनी पीड़ा और एकांत के बीच अश्विनीकुमारों से स्वास्थ्य और सम्मानपूर्ण जीवन की प्रार्थना करती हैं। अपाला अपनी शारीरिक पीड़ा को मंत्र में ढालत...

असरानी बायोग्राफी: 'शोले' के जेलर से लेकर 350 फिल्मों तक का सफर | Asrani Biography in Hindi

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  असरानी: ‘शोले’ के जेलर से कहीं आगे की कहानी | संघर्ष, प्रेम, दोस्ती और अभिनय के कई रंग प्रस्तावना हिंदी सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जिन्हें किसी एक किरदार से इतनी बड़ी पहचान मिलती है कि दर्शक उन्हें उसी किरदार के नाम से याद करने लगते हैं। लेकिन उस एक भूमिका के पीछे छिपी उनकी पूरी जिंदगी और अभिनय यात्रा उससे कहीं ज्यादा बड़ी होती है। गोवर्धन ठाकुरदास असरानी, जिन्हें सिनेमा प्रेमी प्यार से असरानी के नाम से जानते हैं, ऐसे ही कलाकार थे। “हम अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर हैं!” ‘शोले’ में बोला गया यह संवाद असरानी को भारतीय सिनेमा की यादों में हमेशा के लिए दर्ज कर गया। खाकी वर्दी, मूंछें, तनी हुई चाल, चेहरे पर अकड़ और संवाद बोलने का अनोखा अंदाज—आज भी इस किरदार को याद करते ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। लेकिन सवाल है—क्या असरानी सिर्फ ‘शोले’ के जेलर थे? बिल्कुल नहीं। जयपुर के एक मध्यमवर्गीय परिवार से निकलकर मुंबई पहुंचे इस युवक का सपना केवल कॉमेडियन बनने का नहीं था। वे अभिनेता बनना चाहते थे। कभी नायक बनने का सपना देखते थे और अपने अभिनय को लगातार नए रूप में आजमाना चाहते थे। रंगमंच ...